Bhai Dooj – Celebrating beautiful bond between brother and sister.


‘Bhai’ means brother and ‘Dooj’ means two days after new moon, this festival is celebrated between brothers and sisters other than Raksha Bandhan to strengthen the bond of their love. Bhai Dooj is celebrated two days after Diwali, its a day dedicated to the love between brother and sister.

On this day, sisters pray and wish for the long life, health, wealth and prosperity of their brothers. The brothers in return takes a lifelong vow to protect their sisters. On the day of Bhai Dooj, brothers and sisters reaffirm their pious bond of affection.

After the festival of lights, sisters get ready for ‘Bhai Dooj’ or Bhai Phota – when sisters ceremonize their love by putting a fortunate tilak on the forehead of their brothers and perform an Aarti by showing him the light of the holy flame as a mark of affection and protection from evil forces.On this day, sisters pray for the prosperity and wellbeing of their brothers. In return, the brother offers gifts and sweets to their sisters as an expression of love.

Each region in pronounce it with different name Bhayya Duj (Hindi), Yama Dwitiya, Bhagini Hasta Bhojana (Sanskrit), Sodara Bidige (Karnataka), Bhai-Tika (Nepal), Bhai Phota (Bengal), Bhav-Bij (Maharashtra).

The essence of the Bhai dooj or Bhai Phota festival is that it is celebrated to toughen the love between brothers & sisters. It is a day of gift-giving, food-sharing and reaching out to the deepest depths of the heart. Sisters and Brothers indulge themselves on this special occasion by giving each other gifts.


According to Legends, Yamraj, who is the God of Death according to Hindu mythology, went to Yami, his sister on this day. She applied special tilak on his brother’s forehead and also garlanded him along with feeding him with tempting dishes. They celebrated the day happily together and drew great pleasure to the content of their heart. When they parted, Yamraj gifted her sister a special present as his token of love and similarly Yami also gifted her some lovely present which was her hand made gift. That day there was a declaration by Yamraj that people who would receive tilak from their sisters would never be thrown. Therefore, this Bhai Duj day is also referred to as Yama Dwitiya.

There is another belief that Lord Krishna had gone to his sister, Subhadra, when he annihilated Narakasura demon. He was welcomed by his sister with an arti, sweets and flowers. Then she applied the Tikka i.e. the holy tilak on Krishna’s forehead for protection. It is since that day that festival of Tikka is being celebrated as a symbol of love between sisters and brothers. These legends have been followed since then and it became a tradition that the brother has to go to his sister’s place for celebrating Bhai Dooj.

There is one more interesting story behind the celebration of Bhai Dooj festival. Legends say that the founder of Jainism, Mahavir, when attained nirvana, King Nandivardhan, his brother got distressed as he had missed him and was then comforted by Sudarshana, his sister.


On Bhai Dooj, the brothers are invited by their sisters for having a tempting meal usually having their favorite food. This ceremony basically lays emphasis on duties of the brothers for protecting their sisters along with blessings of sisters for their brothers.

The ceremony is carried forward in a traditional way with sisters performing aarti for their brothers and applying a red tikka on the forehead of their brothers. The tikka ceremony on the Bhai Dooj occasion exhibits sister’s prayers for the happy and long life of the brother. Subsequently, the brother blesses his sister and offers her gifts or even cash.

This custom is followed in the states of Haryana and Chandigarh as a grand affair and the sisters who do not have brothers worship the God moon instead. The sisters also apply mehendi on this occasion as a common tradition.

The sisters who have their brothers living far away from them and are unable to visit their house, send the sincerest prayers for the happy and long life of their brothers through the moon god. The sisters perform aarti for the moon god. This is why the children of Hindu call the moon as Chandamama where Chanda signifies moon whereas mama refers to mother’s brother.

Astronomical Significance of the 2nd day of Krittika

As per the Devi Bhagawata and Taittiriya Samhita, the Devas’ Raasa starts in the month of Karttika. The Raasa is the formation process in which consciousness remains to be the control center having all others moving around it.

Vishakha and Krittika are the two intersection points of the equator and ecliptic. The axis of earth moves in a circular way in a period of 26,000 years. The first point has 2 branches starting like blades of pair of scissors and opposite point joining the 2 branches called as Vishakha or Dvi-shakha. Therefore, the occasion of Yama-dvitiya happens to be on 2nd day of Karttika symbolizing a pair of sister-brother.

Vishakha-pattanam has two rivers named as Vamshadhara and Nagavali starting from same place but these are found to be separated all through the journey till the sea therefore it is called Vishakha.


Bhai Dooj katha in Hindi –

एक बुढ़िया थी| उसके सात बेटे और एक बेटी थी| बेटी की शादी हो चुकी थी| जब भी उसके बेटे की शादी होती, फेरों के समय एक नाग आता  और उसके बेटे को डस लेता था| बेटा वही ख़तम हो जाता और बहू विधवा| इस तरह उसके छह बेटे मर गये | सातवे की शादी होनी बाकी थी| इस तरह अपने  बेटों के मर जाने के दुख से बुढ़िया रो रो के अंधी हो गयी थी| भाई दूज आने को हुई तो भाई ने कहा की मैं बहिन से तिलक कराने जाऊँगा| माँ ने कहा ठीक है|

उधर  जब बहिन को पता चला की उसका भाई आ रहा है तो वह खुशी से पागल होकर पड़ोसन के गयी और पूछने लगी की जब बहुत प्यारा भाई घर आए तो क्या बनाना चलिए? पड़ोसन उसकी खुशी को देख कर जलभुन गयी और कह दिया कि,” दूध से रसोई लेप, घी में चावल  पका| ” बहिन ने एसा ही किया| उधर भाई जब बहिन के घर जा रहा था तो उसे रास्ते में साँप मिला| साँप उसे डसने को हुआ|

भाई बोला- तुम मुझे क्यू डस रहे हो? साँप बोला- मैं तुम्हारा काल हूँ| और मुझे तुमको डसना है| भाई बोला- मेरी बहिन मेरा इंतजार कर रही है| मैं जब तिलक करा के वापस लौटूँगा, तब तुम मुझे डस लेना| साँप ने कहा- भला आज तक कोई अपनी मौत के लिए लौट के आया है, जो तुम आऔगे| भाई ने कहा- अगर तुझे यकीन नही है तो तू मेरे झोले में बैठ जा| जब मैं अपनी बहिन के तिलक कर लू तब तू मुझे डस लेना| साँप ने एसा ही किया|
भाई बहिन के घर पहुँच गया| दोनो बड़े खुश हुए|भाई बोला- बहिन, जल्दी से खाना दे, बड़ी भूख लगी है| बहिन क्या करे| न तो दूध की रसोई सूखे, न ही घी में चावल पके| भाई ने पूछा- बहिन इतनी देर क्यूँ लग रही है? तू क्या पका रही है? तब बहिन ने बताया कि एसे एसे किया है| भाई बोला- पगली! कहीं घी में भी चावल पके हैं , या दूध से कोई रसोई लीपे है| गोबर से रसोई लीप, दूध में चावल पका|  बहिन ने एसा ही किया| खाना खा के भाई को बहुत ज़ोर नींद आने लगी| इतने में बहिन के बच्चे आ गये| बोले-मामा मामा हमारे लिए क्या लाए हो?  भाई बोला- में तो कुछ नही लाया| बच्चो ने वह झोला ले लिया जिसमें साँप था| जेसे ही उसे खोला, उसमे से हीरे का हार निकला| बहिन ने कहा- भैया तूने  बताया नही की तू मेरे लिए इतना सुंदर हार लाए हो|  भाई बोला- बहना तुझे पसंद है तो तू लेले, मुझे हार का क्या करना|   अगले दिन भाई बोला- अब मुझे जाना है, मेरे लिए खाना रख दे| बहिन ने उसके लिए लड्डू बना के एक डब्बे मे रख के दे दिए|

भाई कुछ दूर जाकर, थक कर एक पेड़ के नीचे सो गया| उधर बहिन के जब बच्चों को जब भूख लगी तो माँ से कहा की खाना दे दो|  माँ ने कहा- खाना अभी बनने में देर है| तो बच्चे बोले कि मामा को जो रखा है वही दे दो| तो वह बोली की लड्डू बनाने के लिए बाजरा पीसा था, वही बचा पड़ा है चक्की में, जाकर खा लो| बच्चों ने देखा कि चक्की में तो साँप की हड्डियाँ पड़ी है| यही बात माँ को आकर बताई तो वह बावड़ी सी हो कर भाई के पीछे भागी| रास्ते भर लोगों से पूछती की किसी ने मेरा गैल बाटोई देखा, किसी ने मेरा बावड़ा सा भाई देखा| तब एक ने बताया  की कोई लेटा तो है पेड़ के नीचे, देख ले वही तो नहीं| भागी भागी पेड़ के नीचे पहुची| अपने भाई को नींद से उठाया| भैया भैया कहीं तूने मेरे लड्डू तो नही खाए!! भाई बोला- ये ले तेरे लड्डू, नहीं खाए मैने| ले दे के लड्डू ही तो दिए थे, उसके भी पीछे पीछे आ गयी| बहिन बोली- नहीं भाई, तू झूठ बोल रहा है, ज़रूर तूने खाया है| अब तो मैं तेरे साथ चलूंगी| भाई बोला- तू न मान रही है तो चल फिर| चलते चलते बहिन को प्यास लगती है, वह भाई को कहती है की मुझे पानी पीना है| भाई बोला- अब मैं यहाँ तेरे लिए पानी कहाँ से लाउ| देख ! दूर कहीं चील उड़ रहीं हैं,चली जा वहाँ  शायद तुझे पानी मिल जाए| तब बहिन वहाँ गयी, और पानी पी कर जब लौट रही थी तो रास्ते में देखती है कि एक जगह ज़मीन में 6 शिलाए गढ़ी हैं, और एक बिना गढ़े रखी हुई थी| उसने एक बुढ़िया से पूछा कि ये शिलाएँ कैसी हैं| उस बुढ़िया ने बताया  कि- एक बुढ़िया है| उसके सात बेटे थे| 6 बेटे तो शादी के मंडप में ही मर चुके हैं, तो उनके नाम की ये शिलाएँ ज़मीन में गढ़ी हैं, अभी सातवे की शादी होनी बाकी है| जब उसकी शादी होगी तो वह भी मंडप में ही मर जाएगा, तब यह सातवी सिला भी ज़मीन में गड़ जाएगी| यह सुनकर बहिन समझ गयी ये सिलाएँ किसी और की नही बल्कि उसके भाइयों के नाम की हैं| उसने उस बुढ़िया से अपने सातवे भाई को बचाने का उपाय पूछा| बुढ़िया ने उसे बतला दिया कि वह अपने सातवे भाई को केसे बचा सकती है| सब जान कर वह वहाँ से अपने बॉल खुले कर के पागलों की तरह अपने भाई को गालियाँ देती हुई चली|

भाई के पास आकर बोलने लगी- तू तो जलेगा, कुटेगा, मरेगा|भाई उसके एसे व्यवहार को देखकर चोंक गया पर उसे कुछ समझ नही आया| इसी तरह दोनो भाई बहिन माँ के घर पहुँच गये| थोड़े समय के बाद भाई के लिए सगाई आने लगी| उसकी शादी तय हो गयी| जब भाई को सहरा पहनाने लगे तो वह बोली- इसको क्यू सहरा बँधेगा, सहारा तो मैं पहनूँगी| ये  तो जलेगा, मरेगा| सब लोगों ने परेशान होकर सहरा बहिन को दे दिया| बहिन ने देखा उसमें कलंगी की जगह साँप का बच्चा था| बहिन ने उसे निकाल के फैंक दिया| अब जब भाई घोड़ी चढ़ने लगा तो बहिन फिर बोली- ये घोड़ी पर क्यू चढ़ेगा, घोड़ी पर तो मैं बैठूँगी, ये तो जलेगा, मरेगा, इसकी लाश को चील कौवे खाएँगे| सब लोग बहुत परेशान | सब ने उसे घोड़ी पर भी चढ़ने दिया| अब जब बारात चलने को हुई तब बहिन बोली- ये क्यू दरवाजे से निकलेगा, ये तो पीछे के रास्ते से जाएगा, दरवाजे से तो मैं निकलूंगी| जब वह दरवाजे के नीचे से जा रही थी तो दरवाजा अचानक गिरने लगा| बहिन ने एक ईंट उठा कर अपनी चुनरी में रख ली, दरवाजा वही की वही रुक गया| सब लोगों को बड़ा अचंभा हुआ| रास्ते में एक जगह बारात रुकी तो भाई को पीपल के पेड़ के नीचे खड़ा कर दिया| बहिन कहने लगी- ये क्यू छाव में खड़ा होगा, ये तो धूप में खड़ा होगा| छाँव में तो मैं खड़ी होगी|जैसे ही वह पेड़ के नीचे खड़ी हुई, पेड़ गिरने लगा| बहिन ने एक पत्ता तोड़ कर अपनी चुनरी में रख लिया, पेड़ वही की वही रुक गया| अब तो सबको विश्वास हो गया की ये बावली कोई जादू टोना सिख कर आई है, जो बार बार अपने भाई की रक्षा कर रही है| एसे करते करते फेरों का समय आ गया| जब दुल्हन आई तो उसने दुल्हन के कान में कहा- अब तक तो मैने तेरे पति को बचा लिया, अब तू ही अपने पति को और साथ ही अपने मरे हुए जेठों को बचा सकती है| फेरों के समय एक नाग आया, वो जैसे ही दूल्हे को डसने को हुआ , दुल्हन ने उसे एक लोटे में भर के उपर से प्लेट से बंद कर दिया| थोड़ी देर बाद नागिन लहर लहर करती आई| दुल्हन से बोली- तू मेरा पति छोड़|दुल्हन बोली- पहले तू मेरा पति छोड़|नागिन ने कहा- ठीक है मैने तेरा पति छोड़ा|दुल्हन- एसे नहीं, पहले तीन बार  बोल|नागिन ने 3 बार बोला, फिर बोली की अब मेरे पति को छोड़|दुल्हन बोली- एक मेरे पति से क्या होगा, हसने बोलने क लिए जेठ भी तो होना चाहिए, एक जेठ भी  छोड़| नागिन ने जेठ के भी प्राण दे दिए|फिर दुल्हन ने कहा- एक जेठ से लड़ाई हो गयी तो एक और जेठ छोड़| वो विदेश चला गया तो तीसरा जेठ भी छोड़| इस तरह एक एक करके दुल्हन ने अपने 6 जेठ जीवित करा लिए| उधर रो रो के बुढ़िया का बुरा हाल था| कि अब तो मेरा सातवा बेटा भी बाकी बेटों की तरह मर जाएगा| गाँव वालों ने उसे बताया कि उसके सात बेटा और बहुए आ रही है| तो बुढ़िया बोली- अगर यह बात सच हो तो मेरी आँखो की रोशनी वापस आ जाए और मेरे सीने से दूध की  धार बहने लगे| एसा ही हुआ| अपने सारे बहू बेटों को देख कर वह बहुत खुश हुई, बोली- यह सब तो मेरी बावली का किया है| कहाँ है मेरी बेटी?

सब बहिन को ढूँढने लगे| देखा तो वह भूसे की कोठरी में सो रही थी| जब उसे पता चला कि उसका भाई सही सलामत है तो वह अपने घर को चली| उसके पीछे पीछे सारी लक्ष्मी भी जाने लगी| बुढ़िया ने कहा- बेटी, पीछे मूड के देख! तू सारी लक्ष्मी ले जाएगी तो तेरे भाई भाभी क्या खाएँगे| तब बहिन ने पीछे मूड के देखा और कहा- जो माँ ने अपने हाथों से दिया वह मेरे साथ चल, बाद बाकी का भाई भाभी के पास रह| इस तरह एक बहिन ने अपने भाई की रक्षा की|

भैया दूज की  व्रत कथा

छाया भगवान सूर्यदेव की पत्नी हैं जिनकी दो संतान हुई यमराज तथा यमुना. यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थी. वह उनसे सदा यह निवेदन करती थी वे उनके घर आकर भोजन करें. लेकिन यमराज अपने काम में व्यस्त रहने के कारण यमुना की बात को टाल जाते थे।

एक बार कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने अपने भाई यमराज को भोजन करने के लिए बुलाया तो यमराज मना न कर सके और बहन के घर चल पड़े। रास्ते में यमराज ने नरक में रहनेवाले जीवों को मुक्त कर दिया। भाई को देखते ही यमुना ने बहुत हर्षित हुई और भाई का स्वागत सत्कार किया। यमुना के प्रेम भरा भोजन ग्रहण करने के बाद प्रसन्न होकर यमराज ने बहन से कुछ मांगने को कहा। यमुना ने उनसे मांगा कि- आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे यहां भोजन करने आएंगे और इस दिन जो भाई अपनी बहन से मिलेगा और बहन अपने भाई को टीका करके भोजन कराएगी उसे आपका डर न रहे।

यमराज ने यमुना की बात मानते हुए तथास्तु कहा और यमलोक चले गए। तभी से यह यह मान्यता चली आ रही है कि कार्तिक शुक्ल द्वितीय को जो भाई अपनी बहन का आतिथ्य स्वीकार करते हैं उन्हें यमराज का भय नहीं रहता।

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There is no place where the bond of affection between a sister and a brother is glorified to such an extent as in India. The Hindus honor this beautiful relationship two times every year through the festivals of Bhai Dooj and Raksha Bandhan.